उदयपुर ज़िले की मावली तहसील के मेड़ता गाँव में तालाब विवाद अब और गहराता जा रहा है। किसानों की फसलें हर साल डूब रही हैं, लेकिन पंचायत और प्रशासन कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे। इस बीच पंचायत और ग्रामीणों के बयान इस विवाद को और पेचीदा बना रहे हैं।
सरपंच भगवती लाल काकोरिया का पक्ष
सरपंच भगवती लाल काकोरिया ने साफ़ कहा कि –
“यह काम भूतपूर्व सरपंच या किसी और ने किया होगा। न तो किसी ने जानकारी दी और न ही कोई प्रार्थना पत्र पंचायत में जमा कराया गया। कुछ लोग राजनीति वश या दुर्भावना से ग़लत जानकारी फैला रहे हैं। यदि पंचायत में कोई लिखित शिकायत आती है तो हम ज़रूर कार्यवाही करेंगे।”
उन्होंने आगे कहा कि –
- तालाब के पास की ज़मीन राजपूत समाज के कुछ लोगों की है।
- वे उनसे संपर्क कर समाधान निकालने का प्रयास करेंगे।
- दोनों गुट एक ही समाज से हैं – “कुछ लोग चाहते हैं पानी यूं ही बहता रहे, तो कुछ लोग इसे बंद करवाना चाहते हैं। यही आपसी विवाद 4–5 सालों से फूट का कारण है।”
- ज़्यादातर ग्रामीण पानी बंद करवाने के पक्ष में हैं, लेकिन “कुछ लोग ज़मीन बेचने के लिए तालाब तोड़ देते हैं और यह काम अक्सर रात या अंधेरे में होता है।”
किसान रतन सिंह राव का आरोप
वहीं किसान रतन सिंह राव ने पंचायत पर सीधे सवाल उठाए।
“मैं दो बार पंचायत गया शिकायत लेकर, लेकिन वहां कोई मौजूद नहीं था। मैंने और मेरे बेटों ने कई बार सरपंच को फोन किया लेकिन जवाब नहीं मिला।”
उनका आरोप है कि पंचायत किसानों की समस्या पर गंभीर नहीं है और शिकायतों को जानबूझकर अनदेखा किया जाता है।
अन्य ग्रामीणों की नाराज़गी
गाँव के अन्य किसानों और ग्रामीणों ने कहा –
“ये कोई निजी तालाब नहीं है, पूरे गाँव का मामला है और पूरे गाँव का तालाब है। सरपंच अनजान होने का नाटक कर रहा है, जबकि असलियत सभी जानते हैं।”
मामला और उलझा
अब स्थिति यह है कि –
- पंचायत का दावा – कोई शिकायत नहीं मिली, राजनीतिक दुश्मनी में अफवाहें फैलाई जा रही हैं।
- किसानों का आरोप – पंचायत जानबूझकर अनदेखी कर रही है और सरपंच जिम्मेदारी से भाग रहे हैं।
- गाँव में दो गुट – एक चाहता है तालाब का पानी खुले में बहे, दूसरा चाहता है बांध बनाकर पानी रोका जाए।
❓ अब सवाल वही
किसानों की फसलें हर साल तालाब के पानी से डूब रही हैं। पंचायत कहती है शिकायत मिले तो कार्यवाही करेंगे, किसान कहते हैं शिकायतें अनसुनी की जाती हैं।
किसानों की बरबादी रोकेगा कौन? पंचायत, प्रशासन या आपसी झगड़ों में उलझा समाज खुद?










