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ढिंगसरी, बीकानेर: जब हम जुनून और खेल की बात करते हैं, तो महावीर फोगाट का नाम तुरंत याद आता है, जिन्होंने अपनी बेटियों को रेसलिंग चैंपियन बनाने के लिए समाज के सारे बंधनों को तोड़ दिया। ठीक उसी तरह, उत्तर पश्चिम रेलवे के बीकानेर रेल मंडल के कर्मचारी विक्रम सिंह राजवी ने फुटबॉल की दुनिया में ग्रामीण प्रतिभाओं को निखारने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने न केवल फुटबॉल के खेल को छोटे गांवों तक पहुंचाया, बल्कि बिना फीस और बिना संसाधनों के अपनी टीम को नेशनल चैंपियनशिप तक पहुंचाया!

विक्रम सिंह का जुनून तब और मजबूत हुआ जब उन्होंने अपने पिता, अर्जुन पुरस्कार विजेता मगन सिंह राजवी से प्रेरणा ली। अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने का सपना लिए विक्रम सिंह ने 2020 में ‘मगन सिंह राजवी स्पोर्ट्स फाउंडेशन’ की स्थापना की। इस फाउंडेशन में आज करीब 200 बच्चे – लड़के और लड़कियां – बिना किसी शुल्क के फुटबॉल की ट्रेनिंग ले रहे हैं।
विक्रम सिंह का धांसू अंदाज़ तब और चर्चा में आया जब उनके निर्देशन में फाउंडेशन की खिलाड़ी मुन्नी भांभू ने अंडर-16 सेफ गेम्स (काठमांडू, नेपाल) में सिल्वर मेडल जीता। और हाल ही में, अगस्त 2024 में कर्नाटक के बेलगांव में हुई अंडर-17 नेशनल चैंपियनशिप में उनकी टीम की 12 लड़कियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए खिताब पर कब्जा कर लिया।
यह सफर आसान नहीं था। विक्रम सिंह ने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया – चाहे वो समाज के ताने हो या संसाधनों की कमी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी रेलवे की नौकरी से मिलने वाली वेतन को भी उन्होंने खिलाड़ियों के खाने और खेल सामग्रियों पर खर्च किया। उनका उद्देश्य सिर्फ एक था – अपने राज्य और देश को फुटबॉल की दुनिया में एक नई पहचान दिलाना।
विक्रम सिंह के इस धैर्य और जुनून ने साबित कर दिया कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो बड़े से बड़े सपने भी हकीकत बन सकते हैं। अब वो भामाशाहों के सहयोग से इस खेल को और आगे ले जाने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि उनकी टीम विश्वस्तरीय फुटबॉल में भी नाम कमा सके।
विक्रम सिंह की कहानी ने ये साबित किया है कि छोटे गांव से लेकर बड़े मंच तक का सफर सिर्फ मेहनत और जुनून से तय किया जा सकता है!











